देखिये है कैसी विडम्बना

दीपावली
देखिये है कैसी विडम्बना
जो बना दीये
हमारे घरों को रौशनी दिये
उस रौशनी तले है अंधेरा
बच्चे उनके खोज रहे
अधजली फुलझड़ियों को अगले सवेरा
आलोक का विस्तार दीपावली
क्या रहेगी उसकी झोपड़ी अंधियारी
उच्छवास कर रही पराजित अमावस्या
खत्म नहीं हो रही गरीबी की समस्या
घोर अंधकार का हो पलायन
प्रकाश की किरणों का हो अवतरण
गरीबी, विभेद ,मजबूरीयों का हो अपहरण
निराशा का अंधेरा नजर नहीं आए
महलों की रौशनी से
पड़ोस की झोपड़ी जगमगाए
हमारी है यही आराधना
आलोक की सुरसरि का हो प्रवाह
दीये की रौशनी करे खत्म
घृणा , विद्वेष और निराशा की सभा ॥
देखिये है कैसी विडम्बना 

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