लक्ष्य कभी मत भूले !

मेरा नाम रामू चौधरी है और मैं इंजीनियरिंग की पढाई करने 3 साल पहले शहर आया था. मेरे पिता जी सरकारी नौकरी में थे और इसलिए वे मुझे हॉस्टल के खर्च के लिए ठीक-ठाक पैसे भी देते थे. हॉस्टल में दोस्तों आपको तो पता है कि कितनी मौज मस्ती होती है. जब मैं नया नया हॉस्टल में गया तो खूब एन्जॉय करता था.
लाइफ एकदम मस्त थी मेरी, ना कोई टेंशन और ना कोई रोक टोक. हॉस्टल आये मुझे अभी 1 महीना भी नहीं हुआ था कि मने सिगरेट और शराब पीनी शुरू कर दी थी. हॉस्टल में ये सब आम होता है. मेरे साथ के कई लड़के भी सिगरेट और शराब पीते थे. खासकर सीनियर लड़के तो बहुत मौज मस्ती करते थे. वे तो अपने हॉस्टल के कमरों में रोज़ ही पार्टी किया करते थे.

मुझे भी धीरे धीरे ये सब अच्छा लगने लगा और फिर कॉलेज का एक साल यूँ ही मौज मस्ती में निकल गया. जब एक साल बाद रिजल्ट आया तो नंबर बहुत कम थे इसलिए पापा से बहुत डांट पड़ी. पापा ने खूब समझाया कि बेटा पढाई पर ध्यान दो, आजकल कम्पटीशन बहुत ज़्यादा है लेकिन उस वक़्त ये सब बाते अच्छी नहीं लगती थी.
बहरहाल, मैंने पढाई पर भी थोड़ा ध्यान देना शुरू किया लेकिन पता नहीं क्यों मेरा मन पढाई में नहीं लगता था. जैसे ही शाम होती थी, दोस्त हॉस्टल के कमरे में आ जाते थे और फिर वही पेग पर पेग लगते थे.
चूँकि रात को हम पेग लगा लेते थे इसलिए सुबह जल्दी उठने में बड़ी दिक्कत होती थी. मैंने तो सुबह 9 बजे से पहले उठता ही नहीं था और फिर हमेशा कॉलेज के लिए लेट हो जाता था. मुझे मेरे प्रोफेसर ने भी वार्निंग दे रखी थी कि सुबह की क्लास में आया करो वर्ना शार्ट अटेंडेंस हो जायेगी लेकिन मैं था कि अपनी ही धुन में रहता था.
फिर एक दिन मैं और मेरे तीन दोस्त रात को अपने अपने घर से हॉस्टल के लिए वापिस आ रहे थे. रेलवे स्टेशन से निकलते ही हमने ऑटो या रिक्शा ढूंढना शुरू कर दिया। रेलवे स्टेशन से हॉस्टल का रास्ता लगभग 10 किलोमीटर का था. रात के 12:30 बजे का टाइम था, हम किसी रिक्शा या टैक्सी वाले का इंतज़ार रहे थे लेकिन चूँकि रात बहुत हो चुकी थी इसलिए दूर दूर तक ना कोई ऑटो वाला और ना ही कोई रिक्शा वाला दिखाई दे रहा था.
लगभग 45 मिनट के इंतज़ार के बाद एक ऑटो रिक्शा वाला आया और हम बिना कुछ सोचे उस पर चढ़ गए. जब हमने उससे किराया पुछा तो उसने 400 रुपये बताया जो कि बहुत ज़्यादा था. बहुत ज़्यादा मोल भाव करने पर वह 250 रुपये में माना. ऑटो में चलते चलते मैंने ऑटो वाले भईया से पुछा “भाई, इस वक़्त ऑटो रिक्शा वाले क्यों नहीं है है स्टेशन पर तो उसने जवाब दिया कि सभी ऑटो वाले रात को 12 बजे के बाद सोने चले जाते है और फिर सुबह 6 बजे आते है.
तो मैंने उस ऑटो ड्राइवर से पुछा “तो भईया आज आप इतनी रात को कैसे आ गए?”
उस ऑटो वाले ने कहा ” सर.. मैं अक्सर रात को 12 बजे के बाद स्टेशन पर जाता हूँ ताकि थोड़े एक्स्ट्रा पैसे कमा सकू.”
उस ऑटो रिक्शा ड्राइवर ने बताया कि उसका एक बेटा भी है और उसके स्कूल की फीस और अन्य ज़रूरतों के लिए पैसे जमा कर रहा हूँ. मुझे बातो से वो ऑटो वाला पढ़ा लिखा लग रहा था इसलिए मैंने पुछा “भाई आप कितना पढ़े हो?”
उस ऑटो वाले ने कहा “मैंने इंजीनियरिंग की है सर…
ये सुन कर हम सभी दोस्त हैरान रह गए. मैंने पुछा “भईया आपने इंजीनियरिंग की है तो नौकरी क्यों नहीं की?”
“कॉलेज के टाइम मैं सुबह जल्दी नहीं उठता था, पूरा दिन मौज मस्ती करता था और इसलिए इंजीनियरिंग में फेल गया. अगर उस वक़्त मैं पढाई कर लेता तो आज मुझे रात को जाग कर पैसा कमाना ना पड़ता” उस ऑटो रिक्शा ड्राइवर ने मायूसी भरी आवाज़ में कहा.

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