तुम्हारे मौन पर जब लिख गई कविता मेरी

 तुम्हारे मौन पर जब लिख गई कविता मेरी...
 तुम्हारे मौन पर जब लिख गई कविता मेरी...

तुम्हारे मौन पर जब लिख गई कविता मेरी
तभी मैं जान पाया शांत होना है हुनर कोई।

तुम्हारी नजरों से जब झरने लगे आंसू बेहिसाब
तभी जाना मैंने दिल में भी होता है गुबार कोई।

तुम्हारे पास सांसों की गर्मी का अहसास
तभी जाना के मन को ठंड मिलती यहीं।

तुम्हारा पैर से मिट्टी खुरचना, फिर होठों को दबाना
तभी मैं जान पाया गरीबों की मुहब्बत होती है कैसी।

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