दीवाली नहीं आई...

भरपेट भोजन की थाली नहीं आई,
कुछ ऐसे भी घर हैं...
जहां दिवाली नहीं आई

रो रही घर में...
तक-तक के दरवाजे को भूखी बेटियां,
उन्हें अपनी माँ की बुलाती आवाज़,
प्यार भरी थपकी,
छोटी बिटिया के खुशियों की
वो ताली नहीं आई !
अभी तलक लौट कर
इस घर की दिवाली नहीं आई

सुबह के धुंधलके में
दो पुलिसिये चादर में लपेटकर,
लाये थे नग्न लाश !
बेटियां डर गईं
एकटक देखा कि कौन है?
फिर माँ कह झिंझोड़ा
लेकिन उसकी माँ की खुली आँखों ने तका नहीं,
पहली बार-उसकी माँ के चेहरे पे
कोई लाली नहीं आई

ये बेटियां क्या जाने ?

कि करोड़ों के पटाखों में दब गई,
इनके माँ की सिसकियाँ !
देख लो आज तुम भी मेरी कविता,
इसके बदन पे हवस के निशान....
ये आज भी अपने घर खाली नहीं आई,
ये और बात है कि...
इसके घर कोई दिवाली नहीं आई
दीवाली नही आई ...

1 टिप्पणियाँ

Pleas do not enter any spam link in the comment box

और नया पुराने

संपर्क फ़ॉर्म